अधिकार दिवस के रूप में मनाया गया पूर्व राष्ट्रपति की जयंती

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  पिछड़ों की भागीदारी हो ऐसी बनेगी सरकार :अशोक विश्वकर्मा
सकलडीहा चंदौली
। ऑल इंडिया यूनाइटेड विश्वकर्मा शिल्पकार महासभा के तत्वावधान मे कोविड नियमों का अनुपालन करते हुए भारत के सातवें राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह की जयंती अधिकार दिवस के रूप मे शनिवार को डेढावल चौकी स्थित गोविंद विश्वकर्मा के आवास पर मनाया गया। इस दौरान स्मरणाजंली संगोष्ठी को संबोधित करते हुए मुख्य अतिथि राष्ट्रीय अध्यक्ष अशोक कुमार विश्वकर्मा ने कहा की भारत के सर्वोच्च राष्ट्रपति पद को सुशोभित करने वाले  स्वर्गीय ज्ञानी जैल सिंह जी विश्वकर्मा समाज के गौरव और स्वाभिमान के प्रतीक हैं। उन्होंने कहाकि श्रम के सिद्धांत को प्रतिपादित करने वाला विश्वकर्मा समाज आज  आजादी के वर्षों बाद भी शोषित वंचित और भेदभाव का शिकार हो रहा है सभी दलों ने इस समाज का सिर्फ वोट के लिए इस्तेमाल कर उपेक्षित किया जिसके चलते यह समाज समानता और भागीदारी के अधिकारों से अब भी वंचित है ज्ञानी जैल सिंह के संघर्ष त्याग और बलिदान की चर्चा करते हुए कहां की ज्ञानी जैल सिंह का संपूर्ण जीवन संघर्षों में ही व्यतीत हुआ ज्ञानी जी भारतीय राजनीति मे अपनी ही पार्टी के सबसे उपेक्षित राजनेता रहे हैं।कांग्रेस पार्टी ने ज्ञानी जी की घोर उपेक्षा की वह निर्भीक स्वतंत्रता सेनानी और विलक्षण प्रतिभा के धनी राजनेता थे।उनकी अप्रतिम राष्ट्र सेवा त्याग और बलिदान के गुणों ने राष्ट्रपति के सर्वोच्च पद तक पहुंचाया, श्री सिंह को कॉलेज या विश्वविद्यालय मे शिक्षा प्राप्त करने का अवसर नहीं मिला फिर भी उनके ज्ञान का भंडार विशाल था। वह हिंदी और भारतीय भाषाओं के प्रबल समर्थक थे जिनका जन्म पंजाब प्रांत के संधवा नाम के एक छोटे से गांव मे 5 मई 1916 को हुआ था। उनका असली नाम जरनैल सिंह था। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जब यह जेल मे थे तो किसी बात पर जेलर ने  इनका नाम पूछा तो उन्होंने सीना तान कर कहा मेरा नाम जेल सिंह है। जेलर क्रोधित होते हुए पूछा क्या मतलब जरनैल सिंह ने फिर कहा जेल सिंह मतलब जेल का शेर जेलर बौखला गया और उसने डंडो से इनके ऊपर बर्बर पूर्वक प्रहार किया, जरनैल सिंह निर्भीकता से डंडों की मार सहते हुए कहते रहे तुम चाहे जितना भी  मारो मेरी भावना नहीं बदल सकते हो और जेल सिंह जेल सिंह चिल्लाते रहे बाद में इन्हें जेल सिंह के नाम से ही लोग पुकारने लगे यही नाम आगे चलकर जैल सिंह बना। ज्ञानी जी ने 1 अगस्त 1948 को फरीदकोट के राजा के विरुद्ध समानांतर सरकार की घोषणा कर दी इन्हें गिरफ्तार कर घोर यातनाएं दी गई और जीप से बांधकर सड़क पर घसीटने का आदेश हुआ। वह बहुत ही लोमहर्षक दृश्य था।भारत का गृह मंत्री बनते ही उन्होंने स्वतंत्रता सेनानियों को दी जाने वाली पेंशन की शर्तों को उदार बनाया और इसे स्वतंत्रता सैनिक सम्मान पेंशन का नाम दिया गया।  उन्होंने यह परंपरा डाली कि स्वतंत्रता दिवस एवं गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर स्वतंत्रता सेनानियों के सम्मान मे भोज का आयोजन हुआ करेगा।ज्ञानी जैल सिंह व्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रबल पक्षधर थे। संसद द्वारा पारित डाक विधेयक अनुमोदन के लिए जब उनके पास आया तो उन्होंने उस पर हस्ताक्षर करने से साफ इंकार कर दिया और उसे वापस लौटा दिया क्योंकि इस विधेयक में प्रावधान था कि सरकार किसी भी व्यक्ति के पत्र को खोल सकती है।सरकार इस विधेयक के द्वारा अपने आलोचकों का मुंह बंद करना चाहती थी।वह अपने संकल्प और इरादों के बहुत ही पक्के थे। उन्होंने सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं किया वह जुल्म अत्याचार और अन्याय के खिलाफ सदैव संघर्ष करते रहे। अंत में अशोक विश्वकर्मा ने कहा कि उत्तर प्रदेश में अगली सरकार उसी की होगी जो पिछड़ा अति पिछड़ा और वंचितों को सम्मान देते हुए उनकी भागीदारी सुनिश्चित करेगा। संगोष्ठी मे नेताओं ने समाज की एकजुटता का आह्वान किया तथा ज्ञानी जी के जीवन आदर्शो एवं संघर्षों को आत्मसात करने की अपील की।सरकार से यह मांग की गई कि ज्ञानी जी के सम्मान में उनके नाम पर देश सेवा एवं तकनीकी के क्षेत्र में राष्ट्रीय पुरस्कार की घोषणा की जाए तथा संसद भवन के समीप स्वतंत्रता सेनानियों के इतिहास से संबंधित ज्ञानी जी के नाम पर संग्रहालय स्थापित कर उनकी प्रतिमा लगवाई जाए। कार्यक्रम के आरंभ में भगवान विश्वकर्मा एवं ज्ञानी जैल सिंह के चित्र पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्वलित कर श्रद्धा सुमन अर्पित किया गया। इस अवसर पर उपस्थित लोगों में प्रमुख रूप से श्रीकांत  विश्वकर्मा,डॉ प्रमोद कुमार विश्वकर्मा,नंदलाल विश्वकर्मा,सुरेश विश्वकर्मा,रमेश विश्वकर्मा,नागेंद्र विश्वकर्मा,उमेश विश्वकर्मा,विजय विश्वकर्मा, परमेश्वर विश्वकर्मा,धर्मेंद्र विश्वकर्मा,पुष्कर विश्वकर्मा,चंदू विश्वकर्मा,अविनाश विश्वकर्मा, आलोक विश्वकर्मा आदि लोग उपस्थित थे।


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