चनप्रीत सिंह की 21 कविताओं का संग्रह ‘एक अकेला पेड़’ का विमोचन मुंबई में हुआ

काव्य–संग्रह ‘एक अकेला पेड़‘ का विमोचन मुंबई। अभिनेता, कवि और लेखक चनप्रीत सिंह की 21 कविताओं का संग्रह ‘एक अकेला पेड़’ का विमोचन शुक्रवार 18 जून 2021 को यारी रोड,…

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टीम मेरी संपत्ति है,टीम मेरा निवेश है और टीम मेरी ताकत है – चैतन्य जंगा

रिसर्च मीडिया ग्रुप–ए बिजनेस एम्पायर ब्रिक बाई ब्रिक… मुंबई: एक शौकिया कार्टूनिस्ट की यात्रा है, जिसने तीस साल की छोटी सी अवधि में एक व्यापारिक साम्राज्य रिसर्च मीडिया ग्रुप समूह का निर्माण किया और कॉर्पोरेट दिग्गजों के बीच अपने लिए एक जगह बनाई। विजयवाड़ा स्थित रिसर्च मीडिया ग्रुप के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक श्री चैतन्य जंगा कौशल और क्षमताओं के अनूठे मिश्रण के साथ एक उपलब्धि हासिल करने वाले व्यक्ति हैं। उन्होंने अपनी कंपनियों के समूह को बेहद धीरज, धैर्य और दृढ़ संकल्प के माध्यम से उल्लेखनीय ऊंचाइयों तक पहुंचाया ।            चैतन्य जंगा, अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक, रिसर्च मीडिया ग्रुप ने आरएमजी की विस्तार योजनाओं की घोषणा करने के लिए अंधेरी (पश्चिम), मुंबई में एक वर्चुअल प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित किया था,जिसमें लोगों के साथ अपनी अद्भुत जीवन कहानी साझा की। एक व्यवसाय शुरू करने और अनुकूल और प्रतिकूल आर्थिक परिदृश्य दोनों में अपनी पकड़ को मजबूत में बताया। उनका कहना था कि   कार्य का कठिन हिस्सा ग्राहकों, सहकर्मियों, कर्मचारियों, निवेशकों और सहयोगियों जैसे कई लोगों को खुश करना है,अच्छे अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक की पहचान उनकी योग्यता या अनुभव और बाजार का प्रभाव नहीं है,यह लोगों के साथ उनका काम करने का ढंग है।              रिसर्च मीडिया ग्रुप के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक चैतन्य जंग एक प्रेरक उद्यमी हैं। रिसर्च मीडिया की शुरुआत 1992 में चैतन्य…

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कोरोना पर दुनिया का प्रथम उपन्यास “पीपल पर घोंसले नहीं होते!” का विमोचन हुआ

मुंबई।बहुमुखी प्रतिभा के धनी वरिष्ठ पत्रकार व विभिन्न अखबारों व पत्रिकाओं के संपादक रह चुके लेखक अभिलाष अवस्थी द्वारा कोरोना पर दुनिया के प्रथम उपन्यास “पीपल पर घोंसले नहीं होते!”(एक अविस्मरणीय और महान प्रेमगाथा ) मुंबई  रिलीज हुआ। जिसका प्रकाशन प्रलेक प्रकाशन द्वारा किया गया है और जिसका मूल्य 300 रुपए है। यह पुस्तक एमेज़न और अन्य साइट पर उपलब्ध है।        उपन्यास “पीपल पर घोंसले नहीं होते!” में मनु और श्रद्धा के प्रेम की। यद्यपि चरित्रों के नामों से यह कथा प्रसाद की ‘कामायनी’ और कथा में वर्णित प्रेम की उत्कटता व अनन्यता की वजह से धर्मवीर भारती के उपन्यास ‘गुनाहों का देवता’ की  याद दिलाती है, तथापि इस कथा की पृष्ठभूमि एवं परिप्रेक्ष्य उक्त दोनों ही रचनाओं से सर्वथा भिन्न हैं। इन दो कालजयी कृतियों से इस कथा का साम्य मात्र यह है कि उनकी ही तरह यह भी एक प्रेम कथा है।           श्रद्धा एक सामान्य मध्यवर्गीय परिवार की  लड़की है और बचपन से ही उसका साथी है घर के सामने वाली फुटपाथ पर स्थित पीपल का एक पेड़ जिससे वह हमेशा अपना सुख-दुख बाँटती है। उसका एक और साथी है मनु, जिसके साथ खेलते हुए वह बड़ी होती है। बचपन का यह पारस्परिक स्नेह युवा होने पर कब उन्हें एक-दूसरे के लिए अपरिहार्य बना देता है, उन्हें पता ही नहीं चलता। मनु और श्रद्धा का प्रेम-संबंध उच्च जाति के करोड़पति कोठारी परिवार को रास नहीं आता है। कोठारी परिवार श्रद्धा से दूर करने के लिए मनु को पढ़ाई के बहाने विदेश भेज देता है। इधर श्रद्धा भी मनु के प्रोत्साहन से मेडिकल प्रवेश परीक्षा में पूरे दिल्ली प्रदेश में टॉप कर M.B.B.S. में दाख़िला ले लेती है। छ: वर्षों बाद जब मनु भारत लौटता है तब वह एयरपोर्ट से पहला फोन श्रद्धा को ही करता है… श्रद्धा जो उस समय तिपहिया ऑटो से ड्यूटी पर अस्पताल जा रही थी, मनु का फोन रिसीव करती है और बताती है कि उसे अस्पताल से अति-आपातकालीन कॉल पर तुरंत बुलाया गया है। फिर श्रद्धा यह कहकर फोन काट देती है कि अस्पताल आ गया है, और हमारे सभी सीनियर डॉक्टर गेट पर ही एकत्र हैं। दूसरी तरफ मनु को भी एयरपोर्ट पर रोक लिया जाता है, और उसके बंगले पर होनेवाली उसकी वेलकम पार्टी भी रद्द कर दी जाती है|            यही वह काला क्षण था जब यह पता चलता है कि कोरोना महामारी अनेक देशों की तरह भारत में भी दस्तक दे चुकी है। विधि की विडंबना देखिए कि जिस मनु को श्रद्धा से दूर रखने के लिए मनु के परिवार ने लाखों साजिशें कीं, वही मनु कोरोना संक्रमित होकर उसी कोरोना वार्ड में भेज दिया गया जिसकी इंचार्ज डाॅक्टर श्रद्धा सरन ही होती हैं। बॉडी शील्ड और मेडिकल कवच में रखे गये मनु को श्रद्धा तीन दिन बाद पहचान पाती है, लेकिन तब तक मनु  ‘श्रद्धा-श्रद्धा’ फुसफुसाते हुए कोमा में चला जाता है |  यहाँ से कहानी एक नया मोड़ लेती है। शीर्षक ” पीपल पर घोंसले नहीं होते !” पढ़कर ही उपन्यास के प्रति गहरा आकर्षण उत्पन्न होता है और पूरी किताब पढ़ कर समझ आता है  शीर्षक का मर्म।          बहरहाल शुरुआती कुछ पृष्ठों में ही कहानी का इंद्रजाल पाठक को अपने प्रभाव में ले लेता है और शीघ्र ही पाठक स्वयं भी कहानी का हिस्सा बन जाता है। लेखक अभिलाष अवस्थी की प्रेक्षण क्षमता अद्भुत है और स्थितियों का यथार्थ एवं जीवंत चित्रण उनकी विशेषता। सहज एवं तरल लेखनी की वजह से पात्रों के आवेगों-संवेगों में डूबता-उतराता पाठक यह वृहद् कथायात्रा कब पूरी कर लेता है पता ही नहीं चलता।               इसे पढ़ने के बाद पूर्व प्रोडक्शन हेड, बालाजी फिल्म व संगीतकार, प्रोड्यूसर, डाइरेक्टर राम अग्निहोत्री ने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहते है” पिछले 18 सालों में, मैं  बहुत सारे टीवी सीरियल और फिल्मों की मेकिंग का मुख्य हिस्सा रहा हूँ । संपूर्ण फिल्म इंडस्ट्री को अच्छी कहानी की तलाश हमेशा रहती है| ‘ धर्मयुग’ जैसी महान पत्रिका के पत्रकार रहे अभिलाष अवस्थी से ऐसी ही मर्मस्पर्शी कहानी की अपेक्षा की जा सकती है… जो साहित्य और फिल्म की कसौटी पर समान रुप से सफल हो|कोरोना पर दुनिया के पहले उपन्यास के रुप में बेहद चर्चित हो रहे उपन्यास ” पीपल पर घोंसले नहीं होते! ” लेखन जगत की अनूठी और यादगार रचना है| एमेजन और अभिलाष अवस्थी जी  को उपन्यास की अपार सफलता के लिए हार्दिक शुभकामनाओं के साथ बहुत-बहुत बधाई बधाई! 

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डाईबीटीज़ इंसुलिन इंजेक्शन के प्रति भ्रम फैलाना रोका जाय – यूनाइटेड डाईबीटीज़ फोरम’

सरकार व स्वास्थ्य मंत्रालय सोसल मिडिया पर डाईबीटीज़ इंसुलिन इंजेक्शन के प्रति गलत भ्रम फ़ैलाने वालो को रोके– यूनाइटेड डाईबीटीज़ फोरम‘  मुंबई ।आजकल लोगों में डाईबीटीज़ (मधुमेह) की बीमारी काफी देखने को मिलती, जोकि आगे चलकर अन्य बीमारियों का कारण बनती है। जोकि दो प्रकार की होती है, एक टाईप १ जोकि ५ प्रतिशत मरीज़ों को ही होती है,जोकि ज्यादातर बच्चों में होती है और उसका इलाज केवल नियमित तौर पर इंसुलिन इंजेक्शन ही एक है और टाईप २ यह ९५ प्रतिशत मरीज़ो को होता है और यह दवाई व खानपान से कंट्रोल होता है और १० या १५ साल बाद इनमें से काफी लोगों को भीं इंसुलिन इंजेक्शन की जरुरत पड़ती है। टाईप १ डाईबीटीज़ जो ज्यादातर बच्चों में होता है, उसका इलाज केवल नियमित तौर पर इंसुलिन इंजेक्शन है,जोकि देश विदेश सभी जगह इसका इलाज एक ही है। लेकिन कुछ लोगो द्वारा सोसल मिडिया पर यह भ्रम फैलाया जा रहा है कि इसका इलाज उनकी गोली ,योग व ध्यान इत्यादि से ठीक हो सकता है, जिससे लोगों के झांसे में आने के कारण यदि बच्चों इंसुलिन इंजेक्शन ना दिया गया या बंद कर दिया गया तो उनकी जान को खतरा पैदा हो सकता है इसलिए ‘ यूनाइटेड डाईबीटीज़ फोरम’ के अध्यक्ष डॉ. मनोज चावला, सेक्रेटरी डॉ. राजीव कोविल व ट्रैज़रर डॉ. तेजस शाह ने स्वास्थ्य मंत्रालय, भारत सरकार व अन्य संस्थाओं को लेटर भेजकर आग्रह किया गया कि भ्रम फ़ैलाने को रोका जाय।             ‘ यूनाइटेड डाईबीटीज़ फोरम’ एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ. मनोज चावला कहते है,”इंसुलिन पाचक ग्रंथि (पेंक्रिया) द्वारा बनाया जाता है,यह शरीर में कार्बोहाइड्रेट को एनर्जी में बदलने का काम इंसुलिन करती है। जब पेंक्रिया में इंसुलिन बनना बंद हो जाता है, ग्लूकोज एनर्जी में परिवर्तित नहीं हो पता है। और ब्लड वेसेल्स में जमा होकर डाइबिटीज़ की बीमारी का रूप ले लेता है। टाईप १ डाईबीटीज़ का इलाज केवल इंसुलिन इंजेक्शन यदि लोग गलत अफवाहों या बिना पढ़े लिखे के कहने में आकर इंसुलिन इंजेक्शन बंद करते है तो बच्चों की जिंदगी खतरे में आ सकती है इसलिए सरकार व स्वास्थ्य मंत्रालय सोसल मिडिया ऐसे गलत भ्रम फ़ैलाने वालो को रोके, इसलिए यह पत्र भेजा गया है । “

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